क्या हमें परम्परा और अंधविश्वास को मानना चाहिए? जानिये सच

परम्परा और अंधविश्वास

परम्परा और अंधविश्वास, इन दोनों ही शब्दों से हम कहीं न कहीं घिरे हुए हैं ! आज इस विज्ञान की सदी में हम तकनीकी तौर पर विकसित और पहले से ज्यादा बुद्धिमान भी होते जा रहे हैं और अपने सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं ! लेकिन जीवन की इस सुखद यात्रा में हम कहीं न कहीं अपने बीते हुए कल को भी साथ लेकर चल रहे हैं ! जी हाँ, परम्परा और अंधविश्वास हमरा बीता हुआ कल ही तो है जिसको हम आज भी नहीं छोड़ पा रहे है !

कभी-कभी तो परम्परा और अंधविश्वास में हमें फर्क ही मह्सूस नहीं होता ! कभी-कभी परम्परा हमें अंधविश्वास लगती है और अंधविश्वास परम्परा ! अब सवाल ये है कि क्या हमें परम्परा और अन्धविश्वाशों पर विश्वास रखना चाहिए या नहीं? और क्या हमें परम्पराओं और अन्धविश्वाशों का पालन करना चाहिए या नहीं? सबसे पहले तो हमारा ये जानना जरुरी है ! कि परम्परा जिसे हम प्रथा भी बोलते हैं और अंधविश्वास में अंतर क्या है?

दरअसल मध्यकालीन दौर में हम मनुष्यों ने इंसानों के हित के लिए कुछ नियम बनाये जिन नियमों के आधार पर मनुष्यों का जीवन सुखद बन पाये ! जैसे स्त्री और पुरुष को शादी करनी चाहिए और उसके बाद ही सन्तान को जन्म देना चाहिए ! और मनुष्यों ने संगठन की शक्ति को समझा इस वजह से वो लोग ग्रुप में रहने लगे जिससे गावों और शहरों के निर्माण हुए ! खैर ऐसे ही बहुत से उदाहरण हैं जो आज परम्परा कहलाते हैं ! मध्यकालीन दौर में इंसानो ने अपने ही हित के लिए कुछ नियम बनाये कि उन्हें अपना जीवन कैसे व्यतीत करना है ! कुछ समय बाद वही नियम परम्परा कहलाने लगे और आज भी कहीं ना कहीं हम पुरानी परम्पराओं से घिरे हुए हैं ! लेकिन अब भी सवाल वही है कि परम्परा और अंधविश्वास में अंतर क्या है? आइये इस सवाल का जवाब एक उदहारण के द्वारा समझते हैं !

परम्परा और अंधविश्वास को समझाने के लिए में एक काल्पनिक कहानी का जिक्र करूँगा ! एक बार एक ऋषि जंगल में एक कुटिया बनाकर अपने शिष्यों के साथ रहते थे ! वो सन्त महात्मा आस पास के गाँवो में काफी प्रसिद्ध थे ! एक दिन उस ऋषि ने देखा कि एक बिल्ली ने एक बच्चे को जन्म दिया और जन्म देते ही वो बिल्ली मर गई और उसका नवजात बच्चा अकेला रह गया ! उस ऋषि के ह्रदय में करुणा जागी और वो उस बिल्ली के बच्चे को अपनी कुटिया में ले आये और वहीं उसका पालन पोषण करने लगे ! कुछ दिन बाद बच्चा थोड़ा बड़ा हो गया !

वो सन्त महात्मा जब भी भजन या तपस्या के लिए बैठते तो वो बिल्ली का बच्चा ऋषि के आस पास ही फुदकता रहता और कभी उस ऋषि की गोद में बैठ जाता ! उस बिल्ली के बच्चे की इन हरकतों की वजह से ऋषि का भजन या तपस्या में मन नहीं लगता ! अब ऋषि के मन में एक उपाय आया ! वो उस बच्चे को जंगल में तो नहीं छोड़ सकते थे क्योंकि जंगल में वो बच्चा जानवरों का शिखार हो सकता था ! इस वजह से ऋषि ने एक नियम बनाया और अपने शिष्यों से कहा कि जब भी मेरा भजन का समय हुआ करे तो उससे पहले इस बच्चे को सामने वाले पेड़ से बाँध दिया करो ! अगले दिन से नियम का पालन होने लगा और महात्मा जी के भजन के लिए बैठने से पहले वो बच्चा पेड़ से बाँधा जाने लगा ! अब वो ऋषि शान्ति पूर्वक अपना भजन कर सकते थे !

समय गुजरता रहा और नियम का पालन होता रहा ! और एक दिन अचानक उस ऋषि की मृत्यु हो गई ! अब ऋषि की उपाधी को उनके शिष्यों में से एक ने सम्भाला ! लेकिन नियम अब भी वही था जो नये वाले सन्त थे वो भी भजन पर तब बैठते जब उनके शिष्य उस बिल्ली को पेड़ से बाँध देते ! ऐसे ही समय गुजरता रहा और एक दिन अचानक उस बिल्ली की मौत हो गई ! जिस दिन बिल्ली की मौत हुई थी उस दिन सन्त महात्मा भजन के लिए नहीं बैठे ! उनका मानना था की बड़े वाले सन्त महात्मा जी तब तक भजन पर नहीं बैठते थे जब तक बिल्ली पेड़ से नहीं बाँधी जाती थी ! मतलब जब तक बिल्ली को पेड़ से नहीं बांधेगे तब तक भजन का फल नहीं मिलेगा ! तो अगले ही दिन सन्त महात्मा के शिष्य पास के गॉव से एक बिल्ली पकड़ कर लाये और उसको पेड़ से बाँधा गया तब जाके वो महात्मा भजन के लिए बैठे !

समय गुजरता रहा कभी बिल्ली मरती तो कभी ऋषि की मृत्यु होती लेकिन अब उस आश्रम में एक प्रथा बन चुकी थी कि जब तक बिल्ली पेड़ से नहीं बाँधी जाएगी तब तक भजन सफल नहीं होगा ! ये प्रथा आस पास के गॉवों में फेल गई और लोग भजन करने से पहले बिल्ली पेड़ से बाँधने लगे ! मतलब सबसे पहले वाले ऋषि ने अपने हित के लिए एक नियम बनाया और वो नियम बाद में प्रथा यानी परम्परा बन गया ! और वही प्रथा अंधविश्वास में तबदील हो गई ! अंधविश्वास इस प्रकार कि लोग बिना सोचे समझे ये मानने लगे कि बिल्ली को पेड़ से बाँधने के बाद भजन सफल होता है ! ये तो थी एक काल्पनिक कहानी !

लेकिन आप स्वयं विचार कीजिये कि क्या हम आज भी इसी तरह की परम्पराओं और अंधविश्वासो से नहीं घिरे ! अब सवाल आता है कि क्या हमें पुरानी परम्पराओं को निभाना चाहिए या नहीं? तो मेरा मानना है कि परम्परा इंसानों की खुशहाली के लिए होती हैं ! अगर कोई परम्परा हमारा बंधन बन जाये तो उस परम्परा को तोड़ना ही उचित होता है ! क्योंकि बदलाव ही जिंदगी है अगर हम पुरानी परम्पराओं के बोझ तले दबे रहेगें तो हम नई दुनिया का अनुभव नहीं कर पायेंगे ! जिन्हें हम आज परम्परा मानते हैं वो तो बीते हुए कल के कुछ नियम हैं और वो नियम हमारे लिए जब तक सही हैं तब तक हमें उनसे सुख प्राप्त हो रहा है ! जब हमें पुराने नियम बंधन लगने लगें तो हमें उन नियमों को तोड़ नये नियम बनाने चाहिए ! हमें सिर्फ उन्हीं परम्पराओं को तोड़ना चाहिए जिनमे हमें दुःख और कष्टों का सामना करना पड़ रहा है !

सोचो सती प्रथा जैसी परम्परा के बारे में ! पुराने जमाने में लोगों का मानना था ! कि पत्नी से पहले अगर पती की मृत्यु हो जाये तो पत्नी को भी अपने पती की मृत देह के साथ जिन्दा ही जलना होगा तभी पती और पत्नी को स्वर्गवास प्राप्त होगा क्या ये अंधविश्वास वाकई में सच था? नहीं ऐसी परम्परा को हमें तुरन्त ख़त्म कर देना चाहिए ! और अच्छा ही हुआ जो सती प्रथा जैसी भयानक परम्परा को खत्म कर दिया गया ! इस बात की कल्पना मात्रा ही दिल को झकझोर देती है कि क्या होता अगर सती प्रथा जैसी परम्परा आज भी होती !

खैर,आज भी हम बहुत से अंधविश्वासों और परम्पराओं से घिरे हैं ! अगर चलती रोड पर बिल्ली सामने से गुजर जाये तो ट्रैफिक जाम हो जाता है और कोई भी उस रास्ते से गुजरते हुए कतराता है जहाँ से थोड़ी देर पहले बिल्ली गुजरी थी ! क्योंकि हम आज भी मानते हैं कि अगर बिल्ली सामने से गुजर जाये या अगाड़ी काट जाये और हम उस रास्ते पर अगर चले तो हमारे साथ कुछ अशुभ होगा ! एक बार सोच कर देखिए कि आप ऑफिस के लिए लेट हो रहे हो और रास्ते में बिल्ली सामने से गुजर गई और आप कुछ देर के लिए वहीँ खड़े रहे तो क्या आपके साथ कुछ शुभ होगा? नहीं, आप ऑफिस के लिए और लेट होंगे और जैसे ही आप ऑफिस पहुंचोगे तो तब जरूर आपका बॉस आपके साथ कुछ अशुभ करेगा !

क्या आपने कभी सोचा है कि अगर बिल्ली रास्ता काट जाये तो लोग क्यों रुक जाते हैं? और ये अंधविश्वास जैसी परम्परा कब शुरू हुई? आइये जानते हैं !

ये उस दौर की परम्परा है जब लोग बैलगाड़ियों से इधर -उधर जाया करते थे ! उस जमाने में लोग रात में सफर करते थे तो लालटेन या मसाल जलाकर बैलगाड़ियों से चलते थे ! और जब भी कोई बिल्ली अचानक से सामने आ जाती तो वो लोग बैलगाड़ी को थोड़ी देर के लिए रोक देते थे ! इसका कारण ये था कि रात में थोड़े से उजाले से ही बिल्ली की आँखें चमकने लगती हैं तो कही बिल्ली की आँखों में उस चमक को देखकर बैल इधर उधर ना भागने लगें इसलिए वो लोग बैलगाड़ी को रोक देते थे ताकि बैल इधर-उधर भागकर कोई एक्सीडेंट ना करें !

समय के गुजरते उन लोगों का ये नियम आज बहुत बड़ा अंधविश्वास बन चुका है जिसे हम परम्परा बोलते हैं ! मुझे उम्मीद है कि आपको परम्परा और अंधविश्वास में अंतर समझ आया होगा और आप मेरे इस इशारे को भी समझ पाये होंगे कि कौनसी परम्परा को हमें तोड़ना चाहिए और कौनसी परम्परा का पलना चाहिए ! वैसे आपके आस पास के लोग किस प्रकार के अंधविश्वासों से घिरे हुए हैं? प्लीज कमेंट बॉक्स में जरूर बताना !

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